नई दिल्ली: पूर्व चुनाव आयुक्त अ ने चुनाव आयोग की ओर से चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया कानून के दायरे में हो सकती है, लेकिन सिर्फ कानूनी होना ही पर्याप्त नहीं है। उनके मुताबिक असली सवाल यह है कि क्या यह प्रक्रिया आम नागरिकों के लिए निष्पक्ष है।
लवासा ने यह टिप्पणी नेतृत्व, नैतिकता और सार्वजनिक सेवा विषय पर आयोजित एक व्याख्यान के दौरान की। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज, नागरिकों के अधिकार और सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही की जरूरत पर भी अपनी बात रखी।
एसआईआर को लेकर क्या बोले अशोक लवासा?
अशोक लवासा एसआईआर पर अपनी बात रखते हुए कहा कि कानून में मिली शक्ति का इस्तेमाल करना और उस शक्ति का निष्पक्ष तरीके से इस्तेमाल करना दो अलग-अलग बातें हैं।
उनके अनुसार, अगर किसी प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं और फिर उन्हीं लोगों को अपना नाम वापस जुड़वाने के लिए आवेदन और दस्तावेजों की प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है, तो इस व्यवस्था की जरूरत और निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
करोड़ों मतदाताओं के नाम हटाए जाने का दावा
लवासा ने कहा कि एसआईआर के तहत अब तक करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। उन्होंने सवाल किया कि अगर किसी व्यक्ति का नाम हटने के बाद उसे दोबारा आवेदन करने के लिए कहा जाता है, तो क्या ऐसी प्रक्रिया वास्तव में जरूरी थी।
उन्होंने एक बुजुर्ग महिला का उदाहरण भी दिया, जिनके बारे में उन्होंने बताया कि लंबे समय से एक ही स्थान पर रहने के बावजूद उनका नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का नोटिस मिला। लवासा के मुताबिक ऐसी उम्र में किसी व्यक्ति से जटिल दस्तावेजी प्रक्रिया की उम्मीद करना उसके लिए मुश्किल हो सकता है।
मतदाता अधिकार को लेकर जताई चिंता
पूर्व चुनाव आयुक्त ने कहा कि मतदान सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। अगर किसी व्यक्ति को अपना नाम मतदाता सूची में बनाए रखने के लिए कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़े, तो इससे लोगों में लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति निराशा पैदा हो सकती है।
उन्होंने यह चिंता भी जताई कि भारत में पहले से ही बड़ी संख्या में लोग मतदान नहीं करते हैं। ऐसे में चुनावी प्रक्रिया को आम नागरिक के लिए और अधिक कठिन बनाना लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए सही दिशा नहीं हो सकती।
कानून और निष्पक्षता में अंतर
लवासा ने अपनी बात का मुख्य आधार कानून और न्याय के बीच अंतर को बनाया। उनका कहना था कि किसी कार्रवाई के कानूनी होने का मतलब यह नहीं है कि वह हर स्थिति में न्यायसंगत या निष्पक्ष भी हो।
उनके अनुसार न्याय का उद्देश्य केवल कानून के शब्दों को लागू करना नहीं होना चाहिए, बल्कि कानून की भावना और नागरिकों के अधिकारों की भी रक्षा होनी चाहिए।
सरकार और राजनीतिक दलों पर भी टिप्पणी
लवासा ने सिर्फ एसआईआर तक अपनी बात सीमित नहीं रखी। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों के कामकाज को लेकर भी चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि कई बार सरकार और सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के बीच अंतर को नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि दोनों की भूमिका अलग होती है। उनके मुताबिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थाओं की स्वतंत्रता और जवाबदेही बेहद जरूरी है।
संघीय व्यवस्था को लेकर भी चिंता
पूर्व चुनाव आयुक्त ने भारत की संघीय व्यवस्था को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं ने शायद यह नहीं सोचा था कि कभी ऐसी स्थिति आ सकती है जब देश के संघीय ढांचे को लेकर सवाल उठने लगें।
उनका मानना है कि केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक संतुलन लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है।
सरकारी अधिकारियों में संवेदनशीलता की जरूरत
लवासा ने सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और संवेदनशीलता को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से समाज के गरीब और कमजोर वर्गों की समस्याओं को समझने की अपील की।
उनके मुताबिक प्रशासनिक फैसले लेते समय केवल नियमों और प्रक्रियाओं को देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि उन फैसलों का आम लोगों पर वास्तविक प्रभाव क्या पड़ रहा है।
एसआईआर को लेकर क्यों बढ़ी बहस?
एसआईआर मतदाता सूची को लेकर मुख्य बहस इस बात पर है कि योग्य मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने और अपात्र नामों को हटाने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
मतदाता सूची को अपडेट करना चुनावी प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है, लेकिन जब बड़ी संख्या में नाम हटते हैं या नागरिकों से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जाते हैं, तब प्रक्रिया की पारदर्शिता और नागरिकों के लिए उपलब्ध अपील के रास्ते महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
निष्कर्ष
अशोक लवासा एसआईआर पर दिया गया बयान चुनावी प्रक्रिया को लेकर चल रही बहस में एक महत्वपूर्ण आवाज के रूप में सामने आया है। उन्होंने एसआईआर को पूरी तरह अवैध नहीं बताया, बल्कि यह सवाल उठाया कि क्या कानूनी प्रक्रिया वास्तव में निष्पक्ष भी है?
उनकी चिंता मुख्य रूप से मतदाता अधिकार, प्रक्रिया की कठिनाई, संस्थागत जवाबदेही और लोकतांत्रिक भागीदारी से जुड़ी है। ऐसे में आने वाले समय में मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पारदर्शिता और नागरिकों की सुविधा पर चर्चा और तेज हो सकती है।

