नई दिल्ली: मकड़ी को आमतौर पर लोग डर और खतरे से जोड़कर देखते हैं, लेकिन वैज्ञानिकों के लिए उसका जहर भविष्य की दवाओं का संभावित स्रोत भी हो सकता है। भारतीय शोधकर्ताओं ने एक खास मकड़ी की **विष ग्रंथि** का विस्तृत अध्ययन किया है। इस रिसर्च में ऐसे कई अणुओं की पहचान हुई है, जिनका इस्तेमाल भविष्य में कैंसर और एंटीमाइक्रोबियल दवाओं से जुड़े शोध में किया जा सकता है।
हालांकि, इसे अभी कैंसर की दवा की खोज नहीं कहा जा सकता। शोधकर्ताओं ने जिन अणुओं की पहचान की है, वे आगे के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए संभावित उम्मीदवार हैं।
मकड़ी के जहर पर क्यों हो रही है रिसर्च?
मकड़ियों का जहर केवल एक जहरीला पदार्थ नहीं होता। इसमें कई तरह के जैव सक्रिय अणु यानी बायोएक्टिव मॉलिक्यूल्स मौजूद हो सकते हैं।
इनमें पेप्टाइड्स और दूसरे यौगिक शामिल होते हैं, जो जीवों की कोशिकाओं और जैविक प्रक्रियाओं पर अलग-अलग प्रभाव डाल सकते हैं। इसी वजह से वैज्ञानिक स्पाइडर वेनम को नई दवाओं की खोज के लिए एक संभावित प्राकृतिक स्रोत के तौर पर देख रहे हैं।
पहले के शोधों में भी मकड़ी के जहर में मौजूद कुछ घटकों की एंटीमाइक्रोबियल और एंटीकैंसर गतिविधियों की जांच की जा चुकी है।
भारतीय शोधकर्ताओं ने क्या किया?
नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने मकड़ी की विष ग्रंथि पर ध्यान केंद्रित किया। विष ग्रंथि वह हिस्सा है जहां मकड़ी अपना जहर तैयार और संग्रहित करती है।
शोधकर्ताओं ने इस ग्रंथि की आणविक संरचना का अध्ययन किया और इसमें मौजूद अलग-अलग अणुओं की पहचान करने की कोशिश की।
इस तरह के अध्ययन को वैज्ञानिक भाषा में वेनोमिक्स और आणविक विश्लेषण से जोड़कर देखा जाता है। इसका उद्देश्य यह समझना होता है कि जहर में कौन-कौन से घटक मौजूद हैं और वे जैविक स्तर पर किस तरह काम कर सकते हैं।
रिसर्च में क्या मिला?
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों को कई ऐसे अणु मिले जिनमें भविष्य में जैव-चिकित्सीय उपयोग की संभावना दिखाई देती है।
इनमें से कुछ अणुओं को कैंसर रिसर्च और कुछ को माइक्रोब्स के खिलाफ संभावित गतिविधि के संदर्भ में आगे जांचा जा सकता है।
यानी अभी वैज्ञानिकों के सामने अगला सवाल यह है कि इन अणुओं को अलग करके प्रयोगशाला में उनकी वास्तविक क्षमता कितनी है।
क्या मकड़ी के जहर से कैंसर की दवा बन सकती है?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।
कैंसर रिसर्च में किसी प्राकृतिक पदार्थ में संभावित गतिविधि मिलने के बाद कई चरणों से गुजरना पड़ता है। पहले प्रयोगशाला में कोशिकाओं पर परीक्षण किया जाता है। इसके बाद संभावित दवा उम्मीदवारों की सुरक्षा और प्रभावशीलता को अलग-अलग वैज्ञानिक परीक्षणों में जांचना पड़ता है।
इसलिए इस रिसर्च को कैंसर की नई दवा मिलने के बजाय भविष्य की दवा खोज के लिए शुरुआती वैज्ञानिक आधार के रूप में समझना ज्यादा सही होगा।
एंटीमाइक्रोबियल दवाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण?
दुनिया में एंटीबायोटिक और अन्य रोगाणुरोधी दवाओं के प्रति प्रतिरोध एक बड़ी वैज्ञानिक चुनौती बन चुका है।
कुछ अध्ययनों में मकड़ी के जहर से प्राप्त अणुओं में बैक्टीरिया के खिलाफ गतिविधि देखी गई है। उदाहरण के लिए, एक अध्ययन में मकड़ी के विष से प्राप्त घटकों में कुछ बैक्टीरिया के खिलाफ बैक्टीरियोस्टेटिक प्रभाव देखा गया था।
इसी वजह से नए प्राकृतिक स्रोतों से एंटीमाइक्रोबियल दवा विकसित करने की संभावना पर वैज्ञानिक लगातार काम कर रहे हैं।
जहर और दवा के बीच क्या संबंध है?
किसी जीव का जहर उसके शिकार या दुश्मन पर तेजी से असर डालने के लिए विकसित हुआ होता है। इसमें ऐसे अणु हो सकते हैं जो खास कोशिकाओं, प्रोटीन या जैविक रास्तों को निशाना बनाते हैं।
वैज्ञानिक इसी विशेषता को दवा विकास के लिए उपयोगी मानते हैं।
अगर किसी विषैले अणु को नियंत्रित तरीके से इस्तेमाल किया जा सके और उसके नुकसानदायक प्रभाव को कम किया जा सके, तो वह भविष्य में किसी दवा के लिए शुरुआती आधार बन सकता है।
स्पाइडर वेनम में कौन से अणु होते हैं?
मकड़ी के जहर की संरचना प्रजाति के अनुसार काफी अलग हो सकती है। इसमें छोटे पेप्टाइड्स से लेकर बड़े प्रोटीन और दूसरे जैव सक्रिय यौगिक तक पाए जा सकते हैं।
इनमें से कुछ अणु तंत्रिका तंत्र, कोशिका झिल्ली या दूसरे जैविक लक्ष्यों पर प्रभाव डाल सकते हैं।
इसी विविधता के कारण वैज्ञानिकों के लिए हर प्रजाति के विष का अलग अध्ययन करना महत्वपूर्ण है।
इस रिसर्च का अगला चरण क्या होगा?
नई पहचान किए गए अणुओं को सीधे दवा में बदलना संभव नहीं है। इसके लिए आगे कई चरणों में रिसर्च की जरूरत होगी।
वैज्ञानिकों को यह पता लगाना होगा कि:
- कौन-सा अणु किस जैविक लक्ष्य पर काम करता है?
- कैंसर कोशिकाओं पर उसका प्रभाव कितना है?
- स्वस्थ कोशिकाओं पर उसका क्या असर पड़ता है?
- बैक्टीरिया या अन्य माइक्रोब्स के खिलाफ उसकी क्षमता कितनी है?
- शरीर में उसकी सुरक्षा कितनी है?
- क्या उसे दवा के रूप में इस्तेमाल करने योग्य बनाया जा सकता है?
इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही किसी अणु की वास्तविक चिकित्सीय क्षमता का पता चलेगा।
प्राकृतिक स्रोतों से दवा खोजने की दिशा
दवाओं की खोज में वैज्ञानिक लंबे समय से पौधों, समुद्री जीवों, सांपों, मकड़ियों और दूसरे जीवों से मिलने वाले प्राकृतिक अणुओं का अध्ययन करते रहे हैं।
विषैले जीवों के मामले में वैज्ञानिकों की दिलचस्पी इसलिए भी रहती है क्योंकि उनके जहर में कई अत्यधिक विशिष्ट जैव सक्रिय पदार्थ मौजूद हो सकते हैं।
स्पाइडर वेनम इसी बड़े क्षेत्र का एक हिस्सा है, जिसे वैज्ञानिक नई दवाओं और जैव-चिकित्सीय तकनीकों के लिए तलाश रहे हैं
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह रिसर्च?
भारत जैव विविधता के मामले में बेहद समृद्ध देश है। यहां अलग-अलग क्षेत्रों में मकड़ियों और दूसरे जीवों की अनेक प्रजातियां पाई जाती हैं।
इन जीवों के जैविक गुणों का वैज्ञानिक अध्ययन करने से नई दवा खोज और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
ऐसी रिसर्च भारत में प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित आधुनिक विज्ञान को भी मजबूत कर सकती है।
कैंसर के इलाज में कितना समय लग सकता है?
किसी नए अणु को प्रयोगशाला से अस्पताल तक पहुंचने में कई साल लग सकते हैं।
एक संभावित दवा को पहले प्रयोगशाला परीक्षण, फिर प्री-क्लिनिकल अध्ययन और उसके बाद मानव परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। हर चरण में सुरक्षा और प्रभावशीलता की जांच होती है।
इसलिए वर्तमान रिसर्च से यह अनुमान लगाना सही नहीं होगा कि मकड़ी के जहर से बनी दवा जल्द ही बाजार में उपलब्ध हो जाएगी।
शोध का सबसे बड़ा महत्व क्या है?
इस रिसर्च की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वैज्ञानिकों ने मकड़ी की विष ग्रंथि में मौजूद अणुओं को बेहतर तरीके से समझने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
भविष्य में इनमें से कुछ अणु नई दवाओं के विकास के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। हालांकि इसके लिए व्यापक प्रयोगशाला और चिकित्सकीय शोध की आवश्यकता होगी।
निष्कर्ष
मकड़ी के जहर पर शोध विज्ञान की उस दिशा को दिखाता है जहां प्रकृति में मौजूद विषैले पदार्थों को संभावित चिकित्सा उपयोग के लिए समझने की कोशिश की जा रही है। भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा विष ग्रंथि का आणविक अध्ययन और संभावित उपयोग वाले अणुओं की पहचान इस क्षेत्र में आगे की रिसर्च के लिए महत्वपूर्ण आधार दे सकती है।
हालांकि, अभी यह कहना सही नहीं होगा कि मकड़ी के जहर से कैंसर या संक्रमण की दवा तैयार हो गई है। फिलहाल इन अणुओं की कैंसर रिसर्च और एंटीमाइक्रोबियल दवा विकास में संभावित भूमिका की जांच के लिए आगे अध्ययन की जरूरत है।
अगर भविष्य के परीक्षणों में इन अणुओं की सुरक्षा और प्रभावशीलता साबित होती है, तो मकड़ी के जहर से प्राप्त कुछ घटक नई दवाओं की खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

