नई दिल्ली: अंडमान-निकोबार प्रशासन की ओर से ग्रीन AI और डेटा सेंटर स्थापित करने को लेकर जारी किया गया प्रस्ताव कुछ ही दिनों में वापस ले लिया गया। प्रशासन ने 10 अगस्त 2026 को निजी क्षेत्र से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट यानी EOI मांगा था। इसके चार दिन बाद, 14 अगस्त को इस प्रस्ताव को तत्काल प्रभाव से वापस लेने का नोटिस जारी कर दिया गया। प्रशासन ने इसके पीछे केवल “प्रशासनिक कारण” बताए हैं।
इस फैसले ने इसलिए भी ध्यान खींचा क्योंकि प्रस्ताव में ग्रेट निकोबार और लिटिल अंडमान जैसे पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों में भविष्य के ग्रीन AI और डेटा सेंटर ढांचे की संभावनाएं तलाशने की बात कही गई थी।
क्या था पूरा प्रस्ताव?
अंडमान-निकोबार प्रशासन के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग ने 10 अगस्त को निजी क्षेत्र की कंपनियों से EOI मांगा था। इसका उद्देश्य द्वीपों में निजी क्षेत्र की मदद से ग्रीन AI/डेटा सेंटर वर्टिकल विकसित करने की संभावनाओं का अध्ययन करना था।
प्रशासन ने इसके लिए हाइपरस्केलर, क्लाउड सेवा प्रदाता, AI इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियां, डेटा सेंटर डेवलपर और ऑपरेटर, समुद्री इंजीनियरिंग कंपनियां, अक्षय ऊर्जा कंपनियां और समुद्र के नीचे डिजिटल कनेक्टिविटी से जुड़ी कंपनियों से रुचि मांगी थी।
चार दिन बाद क्यों वापस लिया गया प्रस्ताव?
10 अगस्त को जारी EOI को 14 अगस्त को वापस ले लिया गया। प्रशासन की ओर से जारी नोटिस में कहा गया कि प्रस्ताव को “प्रशासनिक कारणों” से तत्काल प्रभाव से वापस लिया जा रहा है।
हालांकि, प्रशासन ने इन प्रशासनिक कारणों की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। यही वजह है कि प्रस्ताव के अचानक वापस लिए जाने को लेकर सवाल भी उठे हैं।
किन जगहों पर डेटा सेंटर की संभावना तलाशी जानी थी?
प्रस्ताव में अंडमान-निकोबार के कई समुद्री क्षेत्रों को संभावित स्थानों के तौर पर बताया गया था। इनमें ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे, एंडरसन बे, विजय नगर बे और गांधी नगर बे शामिल थे। इसके अलावा लिटिल अंडमान के हटबे और नेताजी नगर क्षेत्र भी प्रस्ताव में संभावित स्थानों के तौर पर बताए गए थे। इन क्षेत्रों में डेटा सेंटर से जुड़ी संभावनाओं का तकनीकी और व्यावसायिक अध्ययन किया जाना था।
ग्रीन AI डेटा सेंटर क्यों बनाया जाना था?
प्रस्ताव का उद्देश्य सामान्य डेटा सेंटर के बजाय ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण के लिहाज से टिकाऊ डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की संभावनाएं तलाशना था। प्रशासन के EOI में AI और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग, संप्रभु डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और अक्षय ऊर्जा से चलने वाले डेटा सेंटर जैसे विकल्पों का उल्लेख किया गया था।
इसमें समुद्री पानी या अन्य वैकल्पिक तकनीकों से कूलिंग, कम या बिना मीठे पानी के इस्तेमाल वाली कूलिंग और वेस्ट हीट के उपयोग जैसे विकल्पों की भी बात की गई थी।
समुद्र के पानी से कूलिंग का आइडिया
डेटा सेंटर में बड़ी मात्रा में गर्मी पैदा होती है, इसलिए सर्वर को ठंडा रखने के लिए कूलिंग सिस्टम जरूरी होता है। प्रस्ताव में समुद्री पानी आधारित या दूसरी नई कूलिंग तकनीकों की संभावनाएं तलाशने की बात कही गई थी। इसके अलावा ऐसे सिस्टम पर भी विचार किया जाना था जिसमें मीठे पानी की जरूरत कम हो। यह मॉडल द्वीप क्षेत्र में पानी और ऊर्जा के इस्तेमाल को कम करने के नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा सकता था।
AI और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी था जोर
प्रस्ताव केवल पारंपरिक डेटा स्टोरेज तक सीमित नहीं था। इसमें AI आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर और GPU तथा हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग की संभावनाओं को भी शामिल किया गया था।
इसके अलावा क्लाउड सेवाओं और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बड़े स्तर पर सुविधाएं विकसित करने की संभावना भी तलाशने की बात कही गई थी।
समुद्र के नीचे इंटरनेट कनेक्टिविटी भी प्रस्ताव का हिस्सा
द्वीपों में डिजिटल कनेक्टिविटी को मजबूत करना किसी भी बड़े डेटा सेंटर प्रोजेक्ट के लिए महत्वपूर्ण होगा। इसी वजह से EOI में सबमरीन और टेरेस्ट्रियल डिजिटल कनेक्टिविटी से जुड़े विकल्पों को भी शामिल किया गया था। इसका उद्देश्य अंडमान-निकोबार को मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ने की संभावनाओं को समझना था।
ग्रेट निकोबार परियोजना के बीच उठा मामला
ग्रेट निकोबार में पहले से ही बड़े स्तर की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को लेकर चर्चा होती रही है। ऐसे समय में ग्रीन AI और डेटा सेंटर के प्रस्ताव ने पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन को लेकर बहस को और बढ़ा दिया।
मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि प्रस्ताव में जिन कुछ समुद्री क्षेत्रों का उल्लेख था, वे ड्राफ्ट मास्टर प्लान में वन्यजीव गलियारे, कृषि, जैव विविधता पर्यटन और तटीय पर्यटन जैसी गतिविधियों से जुड़े क्षेत्रों के रूप में चिह्नित थे।
पर्यावरण को लेकर क्यों उठे सवाल?
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह जैव विविधता और संवेदनशील पारिस्थितिकी के लिए जाना जाता है। ऐसे क्षेत्रों में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू करने पर पर्यावरणीय प्रभाव का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है।
डेटा सेंटर को सामान्य तौर पर बड़ी मात्रा में बिजली और कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। इसलिए द्वीप जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ऐसे प्रोजेक्ट की योजना बनाते समय पानी, ऊर्जा, समुद्री पर्यावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान देना जरूरी होगा।
प्रशासन ने क्या कहा?
अभी तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वापसी नोटिस में प्रस्ताव वापस लेने के लिए केवल प्रशासनिक कारणों का उल्लेख किया गया है। विस्तृत कारण नहीं बताए गए हैं।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि प्रस्ताव पर्यावरणीय कारणों से रद्द किया गया है। फिलहाल आधिकारिक तौर पर इतना ही स्पष्ट है कि EOI वापस ले लिया गया है।
क्या भविष्य में फिर आ सकता है प्रस्ताव?
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अंडमान-निकोबार प्रशासन इस तरह का प्रस्ताव दोबारा जारी करेगा या नहीं। चूंकि मूल EOI को केवल संभावनाएं तलाशने के लिए जारी किया गया था और उसमें “नो-कॉस्ट, नो-कमिटमेंट” आधार पर रुचि मांगी गई थी, इसलिए इसे अंतिम डेटा सेंटर परियोजना की मंजूरी नहीं माना जा सकता।
भविष्य में प्रशासन अगर इस क्षेत्र में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की योजना बनाता है, तो नया प्रस्ताव अलग शर्तों के साथ सामने आ सकता है।
निष्कर्ष
अंडमान निकोबार डेटा सेंटर से जुड़ा प्रस्ताव अगस्त 2026 में अचानक चर्चा में आया और उतनी ही तेजी से वापस भी ले लिया गया। प्रशासन ने 10 अगस्त को ग्रीन AI और डेटा सेंटर के विकास के लिए निजी कंपनियों से EOI मांगा था, लेकिन 14 अगस्त को इसे तत्काल प्रभाव से वापस ले लिया गया।
प्रस्ताव में ग्रेट निकोबार और लिटिल अंडमान के कई संभावित स्थानों पर AI, क्लाउड और ग्रीन डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर की संभावनाएं तलाशने की बात थी। हालांकि प्रशासन ने प्रस्ताव वापस लेने की वजह केवल प्रशासनिक कारण बताई है और इसकी विस्तृत जानकारी नहीं दी है।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि यह प्रस्ताव अंतिम परियोजना या निर्माण की मंजूरी नहीं था, बल्कि निजी क्षेत्र से संभावनाएं तलाशने के लिए जारी किया गया EOI था।


