नई दिल्ली: भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का बाजार धीरे-धीरे विस्तार कर रहा है और ऑटो कंपनियां अपनी रणनीति में बदलाव कर रही हैं। इसी बीच हुंडई की EV रणनीति भी चर्चा में है। हुंडई मोटर इंडिया के एमडी और सीईओ तरुण गर्ग ने कंपनी की इलेक्ट्रिक वाहन योजना, सरकारी PLI कार्यक्रम, स्थानीय स्तर पर तकनीक विकसित करने और भारत को वैश्विक ऑटो हब बनाने जैसे मुद्दों पर अपनी राय रखी है।
तरुण गर्ग के मुताबिक, भारत के लिए सिर्फ ज्यादा संख्या में गाड़ियां बनाना पर्याप्त नहीं है। देश को सेमीकंडक्टर, बैटरी सेल और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों में घरेलू क्षमता विकसित करनी होगी, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो सके।
भारत में EV बाजार को लेकर हुंडई की तैयारी
भारत में इलेक्ट्रिक कारों की मांग अभी पारंपरिक पेट्रोल और डीजल वाहनों की तुलना में छोटी है, लेकिन कंपनियां भविष्य के लिए अपनी तैयारी तेज कर रही हैं।
हुंडई भी इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनी लंबी अवधि की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रही है। कंपनी का फोकस सिर्फ वाहन लॉन्च करने पर नहीं बल्कि उत्पादन, तकनीक और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर भी है।
यही कारण है कि हुंडई इलेक्ट्रिक कार रणनीति में स्थानीय उत्पादन और तकनीकी क्षमता को महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है।
तरुण गर्ग ने PLI पर क्या कहा?
ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट सेक्टर के लिए सरकार की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन यानी PLI योजना का उद्देश्य देश में निवेश, उत्पादन और तकनीकी क्षमता बढ़ाना है।
इस योजना से इलेक्ट्रिक वाहन और ऑटो कंपोनेंट क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा मिला है। जून 2026 तक ऑटो और ऑटो कंपोनेंट PLI योजना के तहत करीब 45,477 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित होने और 67,000 से ज्यादा रोजगार पैदा होने की जानकारी सामने आई है।
तरुण गर्ग के विचारों से यह संकेत मिलता है कि आने वाले समय में भारत को प्रोत्साहन आधारित मॉडल के साथ-साथ ऐसी तकनीकी क्षमता भी विकसित करनी होगी, जिससे कंपनियां वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें।
सिर्फ गाड़ियां बनाना पर्याप्त नहीं
भारत दुनिया के बड़े ऑटोमोबाइल बाजारों में शामिल है और यहां वाहनों का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है। लेकिन हाई-टेक कंपोनेंट के लिए आयात पर निर्भरता अभी भी एक चुनौती है।
तरुण गर्ग ने विशेष रूप से सेमीकंडक्टर, EV बैटरी सेल और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में घरेलू क्षमता बढ़ाने की जरूरत बताई है।
अगर इन क्षेत्रों में स्थानीय उत्पादन और तकनीक मजबूत होती है, तो भारतीय ऑटो उद्योग वैश्विक सप्लाई चेन में ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
EV बैटरी सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा
इलेक्ट्रिक कार की लागत और प्रदर्शन में बैटरी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसलिए भारत में बैटरी सेल का स्थानीय उत्पादन बढ़ाना EV उद्योग के लिए बड़ी जरूरत बन गया है।
सरकार भी घरेलू बैटरी उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में निवेश कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार 50 GWh घरेलू बैटरी उत्पादन क्षमता विकसित करने के लिए करीब 18,100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
स्थानीय बैटरी उत्पादन बढ़ने से कंपनियों को सप्लाई चेन के जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।
हुंडई के लिए स्थानीयकरण क्यों जरूरी?
भारत में EV बनाने वाली कंपनियों के सामने केवल कार की असेंबली का सवाल नहीं है। मोटर, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल सिस्टम, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर जैसे कई हिस्से इलेक्ट्रिक वाहन की तकनीक का आधार हैं।
अगर इन महत्वपूर्ण हिस्सों का उत्पादन देश में बढ़ता है, तो कंपनियां लागत, सप्लाई और तकनीकी विकास पर बेहतर नियंत्रण हासिल कर सकती हैं।
इसी वजह से भारत में इलेक्ट्रिक वाहन बाजार का भविष्य स्थानीय सप्लाई चेन के विकास से भी जुड़ा हुआ है।
चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर भी बड़ी चुनौती
EV की बिक्री बढ़ाने के लिए सिर्फ अच्छी इलेक्ट्रिक कारें उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। चार्जिंग नेटवर्क भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
हाल ही में सरकार ने ऑटो कंपनियों से हाईवे पर EV चार्जिंग नेटवर्क की कमियों को दूर करने में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने को कहा है। एक सरकारी अधिकारी के अनुसार मैप किए गए चार्जिंग स्टेशनों में लगभग आधे काम नहीं कर रहे थे।
इससे साफ है कि भारत में EV अपनाने की रफ्तार बढ़ाने के लिए वाहन कंपनियों, सरकार और चार्जिंग कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी होगा।
क्या सिर्फ EV ही भविष्य है?
ऑटो बाजार में इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर उत्साह बढ़ रहा है, लेकिन भारतीय बाजार में अलग-अलग ईंधन तकनीकों की मांग अभी बनी हुई है।
इसी वजह से कंपनियां EV के साथ हाइब्रिड, CNG और पेट्रोल जैसे विकल्पों को भी ध्यान में रख रही हैं। हालिया उद्योग चर्चा में यह भी सामने आया है कि कंपनियों के लिए यह तय करना आसान नहीं है कि भारत में कौन-सी पावरट्रेन तकनीक सबसे तेजी से आगे बढ़ेगी।
ऐसे माहौल में हुंडई के लिए भी बाजार की वास्तविक मांग के अनुसार अपनी रणनीति को लचीला रखना महत्वपूर्ण होगा।
हुंडई का भारत पर बढ़ता फोकस
हुंडई भारत को केवल एक बिक्री बाजार के तौर पर नहीं देख रही है। कंपनी भारत को उत्पादन, निर्यात और तकनीकी विकास के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी विकसित करना चाहती है।
कंपनी ने 2030 तक भारत में लगभग 45,000 करोड़ रुपये के निवेश की योजना की घोषणा की थी। इस रोडमैप में कई नए मॉडल और इलेक्ट्रिक वाहनों पर भी फोकस शामिल है।
भारत में कंपनी की उत्पादन क्षमता और स्थानीय सप्लाई चेन को मजबूत करना इसी लंबी अवधि की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
EV के साथ तकनीक पर भी जोर
भविष्य की कारें केवल इलेक्ट्रिक नहीं होंगी, बल्कि ज्यादा सॉफ्टवेयर आधारित भी होंगी। कारों में कनेक्टेड फीचर, ड्राइवर असिस्टेंस, डिजिटल सिस्टम और दूसरे तकनीकी फीचर बढ़ रहे हैं।
इस बदलाव के लिए ऑटो कंपनियों को केवल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता नहीं बल्कि सॉफ्टवेयर और इलेक्ट्रॉनिक्स में भी निवेश करना होगा। भारत अगर इन क्षेत्रों में अपनी क्षमता बढ़ाता है तो देश के ऑटो उद्योग के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
सरकार और कंपनियों की भूमिका
EV को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए सरकार और ऑटो कंपनियों दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है।
सरकार को चार्जिंग नेटवर्क, बैटरी निर्माण और तकनीकी अनुसंधान को बढ़ावा देना होगा। वहीं कंपनियों को बेहतर उत्पाद, विश्वसनीय तकनीक और मजबूत बिक्री के बाद की सेवाएं उपलब्ध करानी होंगी।
इसके अलावा EV की कीमत को ग्राहकों की पहुंच में रखना भी बाजार के विस्तार के लिए जरूरी होगा।
भारत बन सकता है ग्लोबल EV मैन्युफैक्चरिंग हब?
भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार, इंजीनियरिंग प्रतिभा और मजबूत ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग आधार मौजूद है। अगर देश महत्वपूर्ण EV तकनीकों में स्थानीय क्षमता विकसित कर लेता है, तो यहां से इलेक्ट्रिक वाहनों और कंपोनेंट का निर्यात भी बढ़ाया जा सकता है।
तरुण गर्ग ने भी भारत को केवल उत्पादन की मात्रा बढ़ाने के बजाय उन्नत तकनीकी क्षमता विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है।
आगे क्या होगा?
आने वाले वर्षों में हुंडई की EV रणनीति का फोकस कई क्षेत्रों पर दिखाई दे सकता है—नए इलेक्ट्रिक मॉडल, स्थानीय उत्पादन, बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट की सप्लाई, चार्जिंग व्यवस्था और तकनीकी विकास।
कंपनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह EV बाजार में तेजी से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच ग्राहकों की जरूरत के अनुसार कीमत और तकनीक का संतुलन बनाए रखे।
निष्कर्ष
भारत का ऑटो उद्योग इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ रहा है, लेकिन यह बदलाव केवल EV बेचने तक सीमित नहीं है। बैटरी, सेमीकंडक्टर, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, चार्जिंग नेटवर्क और सॉफ्टवेयर जैसी तकनीकों में घरेलू क्षमता विकसित करना भी उतना ही जरूरी है।
तरुण गर्ग के हालिया बयानों से संकेत मिलता है कि हुंडई की EV रणनीति में भारत को मजबूत उत्पादन और तकनीकी केंद्र बनाने पर जोर है। PLI जैसी सरकारी योजनाएं इस बदलाव को गति दे सकती हैं, लेकिन लंबे समय में भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह हाई-टेक ऑटोमोटिव तकनीक में कितनी आत्मनिर्भरता हासिल करता है।




